Q1. गीता के अनुसार “उद्धरेत् आत्मना” का तात्पर्य क्या है? आत्मोन्नति के साधनों सहित स्पष्ट कीजिए।
- “उद्धरेत् आत्मनात्मानम्” गीता से लिया गया है, जिसका अर्थ है स्वयं अपना उद्धार करना।
- यह श्लोक (6.5) बताता है कि आत्मा ही आत्मा का मित्र और शत्रु है।
- व्यक्ति अपनी उन्नति या अवनति के लिए पूर्णतः स्वयं जिम्मेदार है।
- कर्म योग, बिना फल की इच्छा के कर्तव्य करने से आत्मोन्नति होती है।
Answer: भगवद्गीता के छठे अध्याय के पाँचवें श्लोक में “उद्धरेत् आत्मनात्मानम्” का महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है। यह सिद्धांत भारतीय सामाजिक विचारधारा में व्यक्ति की स्वतंत्रता और आत्म-उत्तरदायित्व पर गहरा प्रकाश डालता है, जिसका अर्थ है कि व्यक्ति को स्वयं ही अपना उद्धार करना चाहिए और स्वयं को कभी अवनति की ओर नहीं ले जाना चाहिए। यह उक्ति इस विचार पर आधारित है कि 'आत्मा ही आत्मा का बंधु है और आत्मा ही आत्मा का शत्रु है'। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य अपनी उन्नति या अवनति के लिए किसी बाहरी शक्ति ...