Q1. निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर (प्रत्येक लगभग 500 शब्दों में) दीजिए ।
- (i)) भारतीय दर्शन ग्रन्थों में काल की सत्ता और स्वरूप पर हुए विचारों का तुलनात्मक विश्लेषण कीजिए। (500 words)
- (ii)) काल की अवधारणा में भारतीय दर्शन से लेकर पौराणिक साहित्य तक क्या समानता पाई जाती है? उदाहरणों के साथ विवेचना करें। (500 words)
- (iii)) पौराणिक, जैन एवं बौद्ध परम्पराओं में काल की अवधारणा किस प्रकार वैदिक चिंतन का विस्तार या पुनर्व्याख्या है? दार्शनिक आधार स्पष्ट कीजिए। (500 words)
- (iv)) सेमेटिक मतों तथा आधुनिक विज्ञान में काल की अवधारणा का परिचय देते हुए भारतीय काल-चिन्तन से उसकी मूलभूत भिन्नताओं का आलोचनात्मक अध्ययन कीजिए। (500 words)
- (v)) सृष्टि-रचना की भारतीय अवधारणा के आलोक में काल के स्वरूप को स्पष्ट कीजिए तथा बताइए कि सृष्टि-चिन्तन काल-गणना की नींव कैसे बनता है। (500 words)
- (vi)) भारतीय परम्परा में भूमण्डल-केन्द्रित दृष्टिकोण का आधार क्या है? सौरमण्डल, भू-भ्रम और काल-निर्धारण के परस्पर सम्बन्ध का विश्लेषण कीजिए। (500 words)
Key Points:
- भारतीय दर्शन में काल की अवधारणा न्याय-वैशेषिक में स्वतंत्र द्रव्य, सांख्य-योग में परिवर्तन का सूचक, अद्वैत में माया, जैन में काल-द्रव्य और बौद्ध में क्षणिक प्रवाह है।
- भारतीय दर्शन व पौराणिक साहित्य में काल चक्रीय, विशालकाय (युग, कल्प), सक्रिय शक्ति (महाकाल) और सृष्टि-संहार से जुड़ा है।
- पौराणिक काल-चिन्तन वैदिक ऋत का विस्तार है; जैन काल-द्रव्य के रूप में अनित्य चक्रीयता देते हैं; बौद्ध क्षणभंगुरता से वैदिक स्थायित्व की पुनर्व्याख्या करते हैं।
- सेमेटिक मतों व आधुनिक विज्ञान में काल रैखिक, सान्त (begin/end) और उद्देश्यपूर्ण (ईश्वरीय/भौतिक) है, जबकि भारतीय चिंतन में यह मुख्यतः चक्रीय व अनादि-अनंत है।
Answer: